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चले! राजनितीका शुद्ध उगमस्थान खोजने!

हम सही दिशामे जा रहे है या नही,ये तो लोग तय करते है.सौ दिन तो ऐसे भी कट जाते है.मगर कुछ दो चार दिन महत्वपूर्ण बन जाते है.हमारा झेडपी के सामने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन.खडसेके भ्रष्टाचार विरोधमे आंदोलन.जलगांव जागृत जनमंच की स्थापना.शिरपूर के रस्ता बनाने के लिये और ग्रामपंचायत के भ्रष्टाचार के विरोध मे आंदोलन.किसानोके मिला अनुदान के लिये आंदोलन.घरकुल के लिये आंदोलन. राज्यपाल महोदय भगतसिंग कोशीयारी की मुलाकात.मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे महोदयकी मुलाकात.रोहा ,पेण का दौरा.अब हैद्राबाद का दौरा.मुख्यमंत्री केसीआर महोदयकी मुलाकात. अब हम दखलपात्र मोड मधे पहुंच चुके हैं.हमे नजरअंदाज करनेवाले,कोसनेवाले भी सोचने लगे है. दखल देने लगे हैं.बस,इसी दिशामे हम चलते जा रहे है.जो लोग हमे कम लेखते थे,कोसते ते वो भी अब समज रहे है.कि ये लोग रूकते नहीं. आगे ही बढते जा रहे है.स्वयं बनाये रास्तेपर चल रहे है. छोटे दिमाग के छोटी सोचवाले लोग ,अच्छे काम, अच्छे लोग को नही पहचानते.उनमे उतनी बुद्धी नही होती है.जब हमारी दूर दूर से खुशबू आने लगती है,तब मानते,समजते.कि,ये हस्ती औरोसे बढकर काम कर है. मुझे यकिन है की,हम सही दिशामे जा रहे है.इसी दिशामे,इसी गती को हम कायम रखेंगे.इन्सान की अच्छाई पहचानना, विश्वास बनाये रखना, प्रतिमा बनाये रखना बहुत जरूरी होता है.छोटी मोटी तकलीफ,या छोटा मोटा स्वार्थ मे आकर हम लंबी दुरीका रास्ता नहीं छोडना चाहते.मेरा अनुभव है, कुछ दोस्त भी मुझे विचलित करनेकी कोशीस करते है.मगर मै मेरे विचारोपर कायम रहता हूं.जो महानुभव से सिखा हूं. मेरा तर्जुबा है कि,जो हमे मदद करे, प्रोत्साहित करे वही दोस्त महत्वपूर्ण समय मे साथ रखता हूं.उलटा पाव चलनेवाला साथ में नही चाहिये.वो भुत और चुडैल श्रेणीका होता है.जो हमे गुमराह करना चाहता है.जो हमे निराश करना चाहता है.जो हमे रोकना चाहता है.नही चाहिये ऐसा साथी.हम इन्सान है. सुलटा पैर चलना है. आगे आगे चलनेका नाम ही जिंदगी है.पिछे पिछे चलना समशान होता है. मुझे मेरा रास्ता मुझेही चुनना है.कोई उंगली पकडनेवाला नही मिला.इसलिये अपनीही बुद्धी लगाकर , सही या गलत का फैसला लेना पडता है.अंधेरेमे चलने जैसी मेरी स्थिती है. मेरी भी ईच्छा है की,कोई गुरू मिले.मुझे दिशा दिखाएं.तुरंत कहे कि,ये सही है,ये गलत है.पर नहीं मिला.क्यों कि मुझसे कोई लाभ नहीं होने वाला है.राजकिय क्षेत्र मे तो हर एक को लाभ चाहिए.वैसा करना मेरा स्वभाव नही है.इसलिये मुझे कोई शिष्य नहीं बनाता है.ना स्विकार करता है.मेरी अवस्था एकलव्य जैसी है.स्वयं ही धनुर्विद्या शिखना.उन्होने तो द्रोणाचार्य को आभासी गुरू मानकर मुर्ती बनायी.सामने रखी.जैसा कि, द्रोणाचार्य एकलव्य को आदेश दे रहे है.मुझे तो वो भी सौभाग्य नहीं मिला.स्वयं को गुरू समझकर चलना कठीण होता है.मुझे प्राप्त ज्ञान के आधारपर मै निर्णय लेता हूं.और चलता हूं.एकलव्य से भी मेरी स्थिती जादा एकांत है.और मैं श्रीकांत बनना चाहता हूं ‌.नदीके प्रवाह के विरूद्ध तैरना चाहता हूं. आण्णा हजारे को ,मैने पुछा कि,आपका गुरू कौन है?जबाब मिला,मेरा कर्म यही मेरा गुरू है.जब कोई काम करने निकलता हूं तो मेरी नियत मुझे रास्ता दिखाती है.बस्स!अपने उदिष्ट मे अपनी नियत मिला दो,तो वही गुरू जैसा आदेश देती है.और मै आगे चलता जाता हूं.धनुर्विद्या सीखनी है ,यह उदिष्ट था.मगर वो संहारक न हो, यही नियत थी.उदिष्ट मे नियत मिला दी.बन गये धनुर्धारी.बिन गुरूके धनुर्धारी.जैसे कि,” घुंगरू बांधकर मीरा नाची थी.और हम नाचे बिन घुंगरू के.” चलते चलते दोस्त बहुत मिले.मगर लाभ लोभ मे कुछ रुक गये.बोले यही हमारा मतलब है.कुछ दोस्तोने लाभ लोभ मे रास्ता ही बदल लिया.बोले,यही हमारा मकसद है.मैं निकला तब अकेला था.चला तो साथी मिले.और आगे चला तो कुछ साथी रुक गये ,कुछ मुड गये.और अकेला बन गया.और साथी मिले,छुटे.ऐसा मिलना और छुट जाना अनुभव बन चुका है.यही अनुभव की गठरी और ज्ञान की पोटली बगल मे लेकर आगे चलना है.नदीके प्रवाह के विरूद्ध तैरना है.खोजना है,कहांसे शुद्ध जल निकलता है.यही सोच हमे गंगोत्री और जम्नोत्री तक पहुंचाती है. तो ,फिर चले! राजनीती का शुद्ध उगमस्थान खोजने!…. शिवराम पाटील९२७०९६३१२२महाराष्ट्र जागृत जनमंचजळगाव.

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"मुक्यांचा बुलंद आवाज" स्टार भारत लाईव्ह एक्स्प्रेस वृत्तसेवा या संकेतस्थळावर प्रकाशित झालेला सर्व मजकूर, लेख आणि त्याचे हक्क, जबाबदारी" संबंधित लेखकांकडे आहेत. प्रसिद्ध झालेल्या मजकुराशी संपादक सहमत असतीलच असे नाही याचे उल्लंघन करणाऱ्यांवर कायदेशीर कारवाई करण्यात येईल. 7397864636 (महाराष्ट्र राज्य)

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